उत्तर प्रदेशबस्ती

बस्ती विकास प्राधिकरण का काला सच: ईमानदार जेई को बलि का बकरा बनाकर, रसूखदारों को बचाने की साज़िश

दामोदर गैस एजेंसी अवैध निर्माण मामला: शासन की जाँच में जेई त्यागी निर्दोष, तत्कालीन सचिव और मेट पर गिरी गाज

विशेष रिपोर्ट: बस्ती विकास प्राधिकरण में भ्रष्टाचार का ‘मायाजाल’, ईमानदार जेई को बलि का बकरा बनाकर रसूखदारों को बचाने की साज़िश

  • BDA में भ्रष्टाचारियों का बोलबाला: ईमानदार अधिकारी को फंसाने के लिए रची गई गहरी साजिश, जाँच में हुआ खुलासा
  • बीडीए के ‘दोषी’ सचिव पर कब होगी कार्रवाई? शासन की रिपोर्ट के बाद भी फाइलें दबाने का आरोप
  • ‘बीडीए’ के भ्रष्ट तंत्र का पर्दाफाश: जेई की ईमानदारी को बनाया गया सजा, क्या कार्रवाई करेंगे जिम्मेदार अधिकारी?

बस्ती। बस्ती विकास प्राधिकरण (BDA) इन दिनों एक बड़े विवाद के केंद्र में है। यहाँ दामोदर गैस एजेंसी के अवैध निर्माण से जुड़े मामले ने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बीडीए के अधिकारियों ने अपने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए एक ईमानदार जूनियर इंजीनियर (JE) को न केवल बलि का बकरा बनाया, बल्कि उन्हें नियम विरुद्ध तरीके से दोषी भी ठहरा दिया।

​क्या है पूरा मामला?

​मामला दामोदर गैस एजेंसी के अवैध निर्माण का है। बीडीए के प्रभारी एक्सईएन (XEN) हरिओम गुप्ता ने तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को इस अवैध निर्माण के लिए जिम्मेदार ठहराया और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की। जबकि सच्चाई यह है कि शासन की ओर से गठित जाँच समिति ने जेई अनिल त्यागी को पूरी तरह से निर्दोष मानते हुए उन्हें ‘क्लीन चिट’ दी है। वहीं, शासन ने तत्कालीन मेट अनुराग मिश्र को दोषी मानते हुए बर्खास्त कर दिया है।

​फाइलों को दबाने का खेल और ‘सचिव’ की चुप्पी

​इस मामले में सबसे गंभीर आरोप तत्कालीन बीडीए सचिव कमलेश चंद्र पर लग रहे हैं। दस्तावेजों से स्पष्ट है कि जेई ने समय रहते अवैध निर्माण की रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंपी थी, लेकिन तत्कालीन सचिव ने उस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की और न ही नोटिस जारी किया।

​शासन की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि यदि सचिव समय रहते जेई की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते, तो अवैध निर्माण का यह मामला इतना नहीं बढ़ता। सवाल यह उठता है कि जब शासन ने सचिव को दोषी माना है, तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई क्यों लंबित है?

​भ्रष्टाचारियों का गठजोड़: ‘एक्सईएन’ से लेकर ‘सदस्यों’ तक की भूमिका

​इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि पूरा तंत्र सवालों के घेरे में है:

  1. मिलीभगत का आरोप: आरोप है कि बीडीए के तत्कालीन एक्सईएन संदीप कुमार और एई अरुण की मिलीभगत के कारण अवैध निर्माण को संरक्षण मिला। एक बीडीए अधिकारी का यह बयान कि “अगर अपने मित्र पत्रकार का काम नहीं करोगे तो बीडीए का काम बंद कर देंगे”, इस पूरे भ्रष्टाचार के ‘नेक्सस’ को बेनकाब करने के लिए काफी है।
  2. BDA सदस्यों की उदासीनता: बीडीए के सदस्यों पर आरोप है कि उन्होंने कभी भी अपनी जिम्मेदारी का ईमानदारी से निर्वहन नहीं किया। यदि ये सदस्य चाहते, तो बीडीए को भ्रष्टाचार मुक्त बना सकते थे, लेकिन मूकदर्शक बनकर इन्होंने भ्रष्टाचार को फलने-फूलने का मौका दिया।

​ईमानदार अधिकारी का उत्पीड़न

​जेई अनिल त्यागी के साथ जो हुआ, वह प्रशासनिक उत्पीड़न का एक काला उदाहरण है। सात साल तक निलंबन झेलने के बावजूद, त्यागी ने कभी रिश्वत नहीं ली। उन्हें केवल इसलिए फँसाया गया क्योंकि वे भ्रष्टाचारियों के अवैध साम्राज्य के रास्ते में बाधा बन रहे थे। स्थानीय स्तर पर उन्हें प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया, यहाँ तक कि उन्हें जानबूझकर बदनाम करने की कोशिशें की गईं।

​अब आगे क्या?

​26 मई 2026 को पत्र संख्या 486 के माध्यम से भेजी गई शासन की जाँच रिपोर्ट ने बीडीए की कलई खोलकर रख दी है। अब जनमानस और जागरूक नागरिकों की नजरें कमिश्नर, जिलाधिकारी (DM) और एडीएम (ADM) पर टिकी हैं।

मुख्य प्रश्न जो शासन को हल करने हैं:

  • ​शासन की रिपोर्ट के बाद भी तत्कालीन सचिव के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
  • ​अवैध निर्माण के पीछे की ‘बड़ी डील’ में शामिल अन्य अधिकारियों की पहचान कर उन पर कब शिकंजा कसा जाएगा?
  • ​क्या बीडीए में भविष्य में किसी ईमानदार अधिकारी को इस तरह प्रताड़ित नहीं होने दिया जाएगा?

​बीडीए का यह मामला केवल एक गैस एजेंसी के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे भ्रष्टाचार की कहानी है जो शहर के विकास प्राधिकरण की नींव को खोखला कर रहा है। जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई चाहती है।IMG 20260531 145856 IMG 20260531 145921 IMG 20260531 WA0011

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